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    यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥ ४८॥

    446. Yajnah: The Sacrifice. 447. Ijyayah: He who is the only to be worshipped. 448. Mahejyah: He who is the best among all to be worshipped. 449. Kratuh: He who is to be worshipped through the sacrifices called kratus. 450. Satram: He who is worshipped by the sacrifice called satram. 451. Satam gatih: The Goal of the pious. 452. Sarva-darsI: The one who knows and can see everything. 453. Nivrttatma: He whose mind is turned away from worldly desires. 454. Sarvajnah: The Omniscient. 455. Jnanam-uttamam: The Greatest Knowledge.

    446. यज्ञः: यज्ञ। 447. इज्यायः: वह जिसकी पूजा केवल की जाती है। 448. महेज्यः: वह जिसकी पूजा सबसे अच्छी होती है। 449. क्रतुः: वह जिसकी क्रतु यज्ञ के माध्यम से पूजा होती है। 450. सत्रम्: वह जिसकी पूजा सत्र यज्ञ के माध्यम से की जाती है। 451. सताम् गतिः: पुण्यकारियों का लक्ष्य। 452. सर्वदर्शी: सब कुछ देखने वाला। 453. निवृत्तात्मा: वह जिसका मन भौतिक इच्छाओं से हट गया है। 454. सर्वज्ञः: सर्वज्ञानी। 455. ज्ञानम्-उत्तमम्: सर्वोत्तम ज्ञान।