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    अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥ ९५॥

    889. Ananta-huta-bhug-bhokta: He Who is indra and brahma. 890. Sukha-dah: The Giver of Bliss to His devotees. 891. Naika-dah: The Giver of many things. 892. Agra-jah: He Who manifests in front of the mukta-s. 893. A-nir-vinnah: He Who is not tired of fulfilling the wishes of His devotees. 894. Sada-marshI: He Who is ever patient. 895. Lokadhishthanam: The Support of all the worlds. 896. Adbhutah: He Who is extremely wonderful.

    889. अनन्त-हुत-भुग्-भोक्ता: वह जो इंद्र और ब्रह्मा है। 890. सुख-दः: अपने भक्तों को आनंद देने वाला। 891. नैक-दः: बहुत सी चीजों का देने वाला। 892. अग्र-जः: वह जो मुक्त आत्माओं के सामने प्रकट होते हैं। 893. आ-निर्विन्नः: वह जो अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने में थका नहीं होता। 894. सदा-मर्षी: वह जो हमेशा सहनशील हैं। 895. लोक-अधिष्ठानम्: सभी लोकों का सहारा। 896. अद्भुतः: वह जो अत्यंत आश्चर्यजनक है।