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    विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥ ९४॥

    880. Vihayasa-gatih: He Who is the means for the attainment of paramapadam. 881. Jyotih: The Light that leads to Sri Vaikuntham and is self-luminous. 882. Su-rucih: He of lovely effulgence. 883. Huta-bhug-vibhuh: He that is the Bright Fortnight of the Moon. 884. Ravih: The Sun with his brilliance. 885. Virocanah: He of various splendors – such as the Sun, moon, day, night, etc. 886. Suryah: One who generates Sri or brilliance in Surya or Agni. 887. Savita: He Who produces or brings life in the form of the Sun. 888. Ravi-locanah: He Who illuminates.

    880. विहयस-गतिः: वह जो परमपद की प्राप्ति के लिए माध्यम है। 881. ज्योतिः: स्वयं प्रकाशमान ज्योति, जो श्री वैकुण्ठम की ओर प्रेरित करती है। 882. सु-रुचिः: वह सुंदर प्रकाश का अधिष्ठान है। 883. हुत-भुग्-विभुः: वह उज्ज्वल पक्ष का चंद्रमा है। 884. रविः: उसकी प्रकाश से होने वाला सूर्य। 885. विरोचनः: उनकी विभिन्न विशेष तेज़ – जैसे कि सूर्य, चंद्रमा, दिन, रात आदि। 886. सूर्यः: जो सूर्य या अग्नि में उनकी ओजस्वी ज्योति का उत्पादन करते हैं। 887. सविता: वह जो सूर्य के रूप में जीवन का उत्पादन करते हैं। 888. रवि-लोचनः: वह जो प्रकाशित करते हैं।