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    उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥ ६७॥

    630. Udirnah: He Who visibly manifests Himself through His incarnations. 631. Sarvatash-cakshuh: He Who is visible to the eyes of all. 632. Anisah: He Who has no one above Him as the Master. 633. Sasvata-sthirah: He Who is eternally existent and steady. 634. Bhusayah: He who lies inside every one of His creations as their antaryami. 635. Bhushanah: He Who becomes adorned. 636. Bhutih: He Who is the personification of Glory. 637. Asokah: He Who is without sorrow. 638. Sokanasanah: The Destroyer of sorrows.

    630. उदीर्णः: वह जो अपने अवतारों के माध्यम से स्पष्ट रूप से प्रकट होते हैं। 631. सर्वतश्चक्षुः: वह जो सभी की दृष्टि के लिए दृश्य हैं। 632. अनीशः: वह जिसके ऊपर कोई भी स्वामी नहीं है। 633. सश्वतस्थिरः: वह जो शाश्वत और स्थिर हैं। 634. भूषयः: वह जो अपने सभी सृजनों के अंतर्यामी के रूप में लेटा हैं। 635. भूषणः: वह जो सजाकर स्वयं को आत्मसात् करते हैं। 636. भूतिः: जो प्रताप की प्रतिष्ठा का आकार हैं। 637. अशोकः: वह जो दुःखरहित हैं। 638. शोकनाशनः: दुखों को नष्ट करने वाले।