1. 100

    स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥ ६६॥

    621. Svakshah: The Beautiful-Eyed. 622. Sva’ngah: The Lovely-bodied. 623. SatAnandah: He of infinite Bliss. 624. Nandih: He who is ever delighted. 625. Jyotir-gaNeSvarah: The Lord of the host of lustrous deities. 626. Vijitatma: He whose mind has been conquered by devotees. 627. Vidheyatma: He who has the jiva-s as subservient to Him. 628. Sat-kirtih: He of true renown. 629. Chinna-samSayah: The Dispeller of all doubts.

    621. स्वक्षः: सुंदर आंखों वाले। 622. स्वांगः: चर्मवान शरीरवाले। 623. सतानन्दः: अनंत आनंद के धारण करने वाले। 624. नन्दिः: वह जो हमेशा आनंदित हैं। 625. ज्योतिर्गणेश्वरः: प्रकाशमान देवताओं के स्वामी। 626. विजितात्मा: वह जिनका मन भक्तों द्वारा जीता गया है। 627. विधेयात्मा: वह जिनके पास जीवात्माएँ अनुसरण करती हैं। 628. सत्कीर्तिः: सच्ची प्रसिद्धि वाले। 629. चिन्नसंशयः: सभी संदेहों को दूर करने वाले।