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    अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥ १००॥

    932. Ananta-rupah: He of infinite Forms. 933. Ananta-srih: He of infinite wealth, glory, power, etc. 934. Jita-manyuh: He Who has conquered His anger. 935. Bayapahah: He Who destroys the fear in the mind of the devotee. 936. Chatur-asrah: One Who is skilled in all aspects. 937. Gabhiratma: He of deep and profound nature. 938. Vidisah: One Who can be reached from all directions. 939. Vyadisah: He Who appoints the different gods in their respective positions. 940. Disah: He Who commands.

    932. अनन्त-रूपः: वह अनंत रूपवाले हैं। 933. अनन्त-श्रीः: वह अनंत धन, महिमा, शक्ति, आदि के धनी हैं। 934. जित-मन्युः: वह जिनकी क्रोध को जीत लिया गया है। 935. भयपहः: वह भक्त के मन में भय को नष्ट करते हैं। 936. चतुराश्रः: वह सभी पहलुओं में माहिर हैं। 937. गहिरात्मा: वह गहरे और गहरे स्वभाव वाले हैं। 938. विदिसः: वह सभी दिशाओं से पहुंचे जा सकने वाले हैं। 939. व्यदिसः: वह जो विभिन्न देवताओं को उनके संबंधित स्थानों में नियुक्त करते हैं। 940. दिसः: वह जो हुक्म देते हैं।