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    मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥ ७४॥

    695. Mano-javah: He Who is swift as thought. 696. Tirtha-karah: He Who is the source of the holy waters. 697. Vasu-retah: The Source of Luster. 698. Vasu-pradah: The Giver of Treasure. 699. Vasu-Pradah: The giver of glory. 700. Vasu-devah: The presiding Deity of the dwadasakshari, 12-lettered vasu-deva mantra. 701. Vasuh: The Dweller in the hearts of His devotees. 702. Vasu-manah: He Who has a pure mind without any afflictions. 703. Havih: He who is the Sacrificial Offering.

    695. मनोजवः: वह जो विचार के रूप में तेज़ है। 696. तीर्थ-करः: पवित्र जल का स्रोत। 697. वसु-रेतः: लौह में चमकने वाले का स्रोत। 698. वसु-प्रदः: धन का देने वाला। 699. वसु-प्रदः: महिमा का देने वाला। 700. वासुदेवः: द्वादशाक्षरी (12-अक्षरी) वासुदेव मंत्र के प्रमुख देवता। 701. वसुः: उनके भक्तों के हृदय में निवास करने वाले। 702. वसु-मनः: उनका मन प्रकोपों से रहित पवित्र मन है। 703. हविः: वह यज्ञ हवन की प्राप्ति करने वाला है।