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    युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥ ३३॥

    301. Yugadi-krt: The Creator at the beginning of a yuga. 302. Yugavartah: He who revolves the yugas. 303. Naika-mayah: He who is responsible for wonders. 304. Mahasanah: He who is a voracious eater. 305. Adrsyah: He Who cannot be seen. 306. Vyakta-rupah: He of a manifest form. 307. Sahasra-jit: The Conqueror of thousands. 308. Ananta-jit: One whose victory is endless.

    301. युगादि-कृत्: युग की शुरुआत में सृजनहार। 302. युगवर्तः: जो कण्टकों को घुमाते हैं। 303. नैक-मायः: जो आश्चर्यकर के लिए जवाबदेह हैं। 304. महासनः: जो भोजन करने में उत्सुक हैं। 305. अदृश्यः: जिसे देखा नहीं जा सकता। 306. व्यक्त-रूपः: प्रकट स्वरूपवाले। 307. सहस्र-जित्: हजारों को परास्त करने वाले। 308. अनंत-जित्: जिनकी विजय अनंत है।