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    वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः । वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥ २८॥

    257. Vrishahi: One who shines in the form of dharma. 258. Vrishabhah: He who showers his grace. 259. Vishnuh: One who pervades everything. 260. Vrisha-parva: He who has provided the steps of dharma to reach Him. 261. Vrishodarah: One who has dharma as his belly. 262. Vardhanah: He who nourishes. 263. Vardhamanah: He who grows. 264. Viviktah: He who is unique. 265. Sruti-sagarah: He who is the sea where all Vedas take us.

    257. वृषाहि: धर्म के रूप में प्रकाशित होने वाले। 258. वृषभः: वह जो अपनी कृपा बरसाते हैं। 259. विष्णुः: वह जो सबकुछ व्याप्त करते हैं। 260. वृषपर्वः: वह जो हमें उसके पास पहुँचने के लिए धर्म की सीढ़ियों को प्रदान करते हैं। 261. वृषोदरः: वह जिनके पेट में धर्म है। 262. वर्धनः: वह जो पोषण करते हैं। 263. वर्धमानः: वह जो बढ़ते हैं। 264. विविक्तः: वह जो अनूठा है। 265. श्रुतिसगरः: वह समुद्र है जिसमें सभी वेद हमें ले जाते हैं।