1. 18

    कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुतेगुणरङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भ सुखानुभवम् । तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥

    Whoever sprinkles the sacred precincts of Your abode with water from a golden pot will attain the position of Indra by Your grace. O consort of Lord Siva, I take refuge at Your holy feet. Deign to bless me with all prosperity, You who have charming locks of hair, O Daughter of the Mountain, hail unto You, hail unto You. ॥ 18 ॥

    स्वर्ण के समान चमकते घड़ों के जल से जो आपके प्रांगण की रंगभूमि को प्रक्षालित कर उसे स्वच्छ बनाता है, वह इन्द्राणी के समान विशाल वक्ष:स्थलवाली सुन्दरियों का सान्निध्य-सुख अवश्य ही प्राप्त करता है। हे सरस्वति! मैं आपके चरणों को ही अपनी शरणस्थली बनाऊँ; मुझे कल्याणकारक मार्ग प्रदान करो। हे भगवान् शिव की प्रिय पत्नी महिषासुर मर्दिनी पार्वती! आपकी जय हो, जय हो ॥ १८ ॥