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    नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः । श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥

    (O Mother) I have not worshipped you as prescribed by tradition with various rituals, (On the other hand) what rough thoughts did my mind not think and my speech utter? O Shyama, inspite of this, if you indeed, to a little extent, to this orphan … have extended your grace, O supreme mother, it indeed only becomes you (i.e. is possible for you).

    माँ श्यामा ! नानाप्रकार के पूजन सामग्रियों से सभी विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना मुझसे न हो सकी | सदा कठोर भाव का चिंतन करने वाली मेरे वाणी ने कौन सा अपराध नहीं किया है ? फिर भी तू स्वयं ही प्रयत्न करके मुझ अनाथ पर जो किंचित कृपा दृष्टि जो रखती हो , माँ! यह तुम्हारे ही योग्य है | तुम्हारे जैसी दयामयी माता ही मेरे जैसे कुपुत्र को भी आश्रय दे सकती है |