1. 12

    दृषद्विचित्र तल्पयोर्भुजङ्ग मौक्तिक स्रजोर्गरिष्ठ रत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्ष पक्षयोः । तृणारविन्द चक्षुषोः प्रजामही महेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥ १२ ॥

    When will I worship Lord Sadasiva (eternally auspicious) God, with equal vision towards the people and an emperor, and a blade of grass and lotus-like eye, towards both friends and enemies, towards the valuable gem and some lump of dirt, towards a snake and a garland and towards varied ways of the world. ॥ 12 ॥

    मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता, जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि, घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति, सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति, सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति? ॥ १२ ॥