1. 11

    राजोवाच यथा भगवता ब्रह्मन् मथितः क्षीरसागरः । यदर्थं वा यतश्चाद्रिं दधाराम्बुचरात्मना ।। ८-५-११ ।।

    King Parīkṣit inquired: O great brāhmaṇa, Śukadeva Gosvāmī, why and how did Lord Viṣṇu churn the Ocean of Milk? For what reason did He stay in the water as a tortoise ।। 8-5-11 ।।

    राजा परीक्षित ने पूछा : हे परम ब्राह्मण, शुकदेव गोस्वामी! भगवान् विष्णु ने क्षीरसागर का मंथन क्यों और कैसे किया? वे कच्छप रूप में जल के भीतर किसलिए रहे ।। ८-५-११ ।।

  2. 12

    यथामृतं सुरैः प्राप्तं किं चान्यदभवत्ततः । एतद्भगवतः कर्म वदस्व परमाद्भुतम् ।। ८-५-१२ ।।

    And hold up Mandara Mountain? How did the demigods obtain the nectar, and what other things were produced from the churning of the ocean? Kindly describe all these wonderful activities of the Lord. ।। 8-5-12 ।।

    और मन्दर पर्वत को क्यों धारण किये रहे? देवताओं ने किस तरह अमृत प्राप्त किया? और सागर मन्थन से अन्य कौन-कौन सी वस्तुएँ उत्पन्न हुईं? कृपा करके भगवान् के इन सारे अद्भुत कार्यों का वर्णन करें। ।। ८-५-१२ ।।

  3. 13

    त्वया सङ्कथ्यमानेन महिम्ना सात्वतां पतेः । नातितृप्यति मे चित्तं सुचिरं तापतापितम् ।। ८-५-१३ ।।

    My heart, which is disturbed by the three miserable conditions of material life, is not yet sated with hearing you describe the glorious activities of the Lord, the Supreme Personality of Godhead, who is the master of the devotees. ।। 8-5-13 ।।

    मेरा हृदय भौतिक जीवन के तीन तापों से विचलित है, किन्तु वह अब भी आपके द्वारा वर्णित किये जा रहे भक्तों के स्वामी भगवान् के यशस्वी कार्यकलापों को सुनकर तृप्त नहीं हुआ है। ।। ८-५-१३ ।।

  4. 14

    सूत उवाच सम्पृष्टो भगवानेवं द्वैपायनसुतो द्विजाः । अभिनन्द्य हरेर्वीर्यमभ्याचष्टुं प्रचक्रमे ।। ८-५-१४ ।।

    Śrī Sūta Gosvāmī said: O learned brāhmaṇas assembled here at Naimiṣāraṇya, when Śukadeva Gosvāmī, the son of Dvaipāyana, was thus questioned by the King, he congratulated the King and then endeavored to describe further the glories of the Supreme Personality of Godhead. ।। 8-5-14 ।।

    श्रीसूत गोस्वामी ने कहा : यहाँ नैमिषारण्य में एकत्रित हे विद्वान ब्राह्मणो! जब द्वैपायन पुत्र शुकदेव गोस्वामी से राजा ने इस तरह से प्रश्न पूछा तो उन्होंने राजा को बधाई दी और भगवान् के यश को और भी आगे वर्णन करने का प्रयास किया। ।। ८-५-१४ ।।

  5. 15

    श्रीशुक उवाच यदा युद्धेऽसुरैर्देवा बाध्यमानाः शितायुधैः । गतासवो निपतिता नोत्तिष्ठेरन् स्म भूयशः ।। ८-५-१५ ।।

    Śukadeva Gosvāmī said: When the asuras, with their serpent weapons, severely attacked the demigods in a fight, many of the demigods fell and lost their lives. Indeed, they could not be revived ।। 8-5-15 ।।

    श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब असुरों ने अपने-अपने सर्प-आयुधों से युद्ध में देवताओं पर घमासान आक्रमण कर दिया तो अनेक देवता धराशायी हो गये और मर गये। वे फिर से जीवित नहीं किये जा सके। ।। ८-५-१५ ।।