1. 6

    सोऽहं दुर्मायिनस्तेऽद्य वज्रेण शतपर्वणा । शिरो हरिष्ये मन्दात्मन्घटस्व ज्ञातिभिः सह ।। ८-११-६ ।।

    Today, with my thunderbolt, which has hundreds of sharp edges, I, the same powerful person, shall sever your head from your body. Although you can produce so much jugglery through illusion, you are endowed with a poor fund of knowledge. Now, try to exist on this battlefield with your relatives and friends. ।। 8-11-6 ।।

    आज, मैं, वही शक्तिशाली व्यक्ति, हजारों तेज धारों वाले अपने वज्र से तुम्हारे सिर को शरीर से काटकर अलग कर दूँगा। यद्यपि तुम माया द्वारा पर्याप्त चमत्कार दिखा सकते हो, किन्तु तुम्हारा ज्ञान अत्यल्प है। अब तुम अपने परिजनों तथा मित्रों सहित युद्धभूमि में ठहरने की ही चेष्टा दिखा करो। ।। ८-११-६ ।।

  2. 7

    बलिरुवाच सङ्ग्रामे वर्तमानानां कालचोदितकर्मणाम् । कीर्तिर्जयोऽजयो मृत्युः सर्वेषां स्युरनुक्रमात् ‌।। ८-११-७ ।।

    Bali Mahārāja replied: All those present on this battlefield are certainly under the influence of eternal time, and according to their prescribed activities, they are destined to receive fame, victory, defeat and death, one after another. ‌।। 8-11-7 ।।

    बलि महाराज ने उत्तर में कहा : सभी लोग जो इस युद्धभूमि में उपस्थित हैं निश्चय ही नित्य काल के वश में हैं और वे अपने-अपने नियत कर्मों के अनुसार क्रमश: यश, विजय, हार तथा मृत्यु प्राप्त करेंगे। ‌।। ८-११-७ ।।

  3. 8

    तदिदं कालरशनं जनाः पश्यन्ति सूरयः । न हृष्यन्ति न शोचन्ति तत्र यूयमपण्डिताः ।। ८-११-८ ।।

    Seeing the movements of time, those who are cognizant of the real truth neither rejoice nor lament for different circumstances. Therefore, because you are jubilant due to your victory, you should be considered not very learned. ।। 8-11-8 ।।

    काल की गतियों को देखकर, जो लोग वास्तविक सत्य से अवगत हैं, वे विभिन्न परिस्थितियों के लिए न तो हर्षित होते हैं, न सोचते हैं। चूँकि तुम लोग अपनी विजय पर हर्षित हो अत: तुम्हें अत्यन्त विद्वान नहीं कहा जा सकता। ।। ८-११-८ ।।

  4. 9

    न वयं मन्यमानानामात्मानं तत्र साधनम् । गिरो वः साधुशोच्यानां गृह्णीमो मर्मताडनाः ।। ८-११-९ ।।

    You demigods think that your own selves are the cause of your attaining fame and victory. Because of your ignorance, saintly persons feel sorry for you. Therefore, although your words afflict the heart, we do not accept them. ।। 8-11-9 ।।

    तुम देवता लोग अपने आपको अपनी ख्याति तथा विजय प्राप्त करने का कारण मानते हो। तुम लोगों की अज्ञानता के कारण साधु पुरुष तुम्हारे लिए शोक करते हैं। अतएव तुम्हारे वचन मर्मस्पर्शी होते हुए भी हमें स्वीकार्य नहीं हैं। ।। ८-११-९ ।।

  5. 10

    श्रीशुक उवाच इत्याक्षिप्य विभुं वीरो नाराचैर्वीरमर्दनः । आकर्णपूर्णैरहनदाक्षेपैराहतं पुनः ।। ८-११-१० ।।

    Śukadeva Gosvāmī said: After thus rebuking Indra, King of heaven, with sharp words, Bali Mahārāja, who could subdue any other hero, drew back to his ear the arrows known as nārācas and attacked Indra with these arrows. Then he again chastised Indra with strong words. ।। 8-11-10 ।।

    शुकदेव गोस्वामी ने कहा : स्वर्ग के राजा इन्द्र को इस प्रकार कटु वचनों से फटकारने के बाद वीरों को मर्दन करने वाले बलि महाराज ने नाराच बाणों को अपने कान तक खींचा और उनसे इन्द्र पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने पुन: इन्द्र को कठोर शब्दों से प्रताडि़त किया। ।। ८-११-१० ।।