1. 56

    देवा ऊचुः यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ।। ४-१-५६ ।।

    The demigods said: Let us offer our respectful obeisances unto the transcendental Personality of Godhead, who created as His external energy this cosmic manifestation, which is situated in Him as the air and clouds are situated in space, and who has now appeared in the form of Nara-Nārāyaṇa Ṛṣi in the house of Dharma. ।। 4-1-56 ।।

    देवताओं ने कहा : हम उस दिव्य रूप भगवान् को नमस्कार करते हैं जिन्होंने इस दृश्य जगत की सृष्टि अपनी बहिरंगा शक्ति के रूप में की है, जो उनमें उसी प्रकार स्थित है, जिस प्रकार वायु तथा बादल आकाश में रहते हैं और जो अब धर्म के घर में नर-नारायण ऋषि के रूप में प्रकट हुए हैं। ।। ४-१-५६ ।।

  2. 57

    सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान् सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः । दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ।। ४-१-५७ ।।

    Let that Supreme Personality of Godhead, who is understood by truly authorized Vedic literature and who has created peace and prosperity to destroy all calamities of the created world, be kind enough to bestow His glance upon the demigods. His merciful glance can supersede the beauty of the spotless lotus flower which is the home of the goddess of fortune. ।। 4-1-57 ।।

    वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जो वास्तविक रूप से प्रामाणिक वैदिक साहित्य द्वारा जाने जाते हैं और जिन्होंने सृष्ट जगत की समस्त विपत्तियों को विनष्ट करने के लिए शान्ति तथा समृद्धि का सृजन किया है, हम देवताओं पर कृपापूर्ण दृष्टिपात करें। उनकी कृपापूर्ण चितवन लक्ष्मी के आसन निर्मल कमल की शोभा को मात करने वाली है। ।। ४-१-५७ ।।

  3. 58

    एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ । लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम् ।। ४-१-५८ ।।

    [Maitreya said:] O Vidura, thus the demigods worshiped with prayers the Supreme Personality of Godhead appearing as the sage Nara-Nārāyaṇa. The Lord glanced upon them with mercy and then departed for Gandhamādana Hill. ।। 4-1-58 ।।

    [मैत्रेय ने कहा :] हे विदुर, इस प्रकार देवताओं ने नर-नारायण मुनि के रूप में प्रकट श्रीभगवान् की पूजा की। भगवान् ने उन पर कृपा-दृष्टि डाली और फिर गन्धमादन पर्वत की ओर चले गये। ।। ४-१-५८ ।।

  4. 59

    ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ।। ४-१-५९ ।।

    That Nara-Nārāyaṇa Ṛṣi, who is a partial expansion of Kṛṣṇa, has now appeared in the dynasties of Yadu and Kuru, in the forms of Kṛṣṇa and Arjuna respectively, to mitigate the burden of the world. ।। 4-1-59 ।।

    नर-नारायण ऋषि कृष्ण के अंश विस्तार हैं और अब जगत का भार उतारने के लिए यदु तथा कुरु वंशों में क्रमश: कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में प्रकट हुए हैं। ।। ४-१-५९ ।।

  5. 60

    स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत् । पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम् ।। ४-१-६० ।।

    The predominating deity of fire begot in his wife, Svāhā, three children, named Pāvaka, Pavamāna and Śuci, who exist by eating the oblations offered to the fire of sacrifice. ।। 4-1-60 ।।

    अग्निदेव की पत्नी स्वाहा से तीन संताने उत्पन्न हुई जिनके नाम पावक, पवमान तथा शुचि हैं, जो यज्ञ की अग्नि में डाली गई आहुतियों को खाने वाले हैं। ।। ४-१-६० ।।