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    श्रीशुक उवाच आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्नद्रष्टुरिवाञ्जसा ।। २-९-१ ।।

    Śrī Śukadeva Gosvāmī said: O King, unless one is influenced by the energy of the Supreme Personality of Godhead, there is no meaning to the relationship of the pure soul in pure consciousness with the material body. That relationship is just like a dreamer’s seeing his own body working. ।। 2-9-1 ।।

    श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा—हे राजन्, जब तक मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्ति से प्रभावित नहीं होता तब तक भौतिक शरीर के साथ शुद्ध चेतना में शुद्ध आत्मा के सम्बन्ध कोई अर्थ नहीं होता। ऐसा सम्बन्ध स्वप्न देखने वाले द्वारा अपने ही शरीर को कार्य करते हुए देखने के समान है। ।। २-९-१ ।।

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    बहुरूप इवाभाति मायया बहुरूपया । रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ।। २-९-२ ।।

    The illusioned living entity appears in so many forms offered by the external energy of the Lord. While enjoying in the modes of material nature, the encaged living entity misconceives, thinking in terms of “I” and “mine.” ।। 2-9-2 ।।

    मोहग्रस्त जीवात्मा भगवान् की बहिरंगा शक्ति के द्वारा प्रदत्त अनेक रूप धारण करता है। जब बद्ध जीवात्मा भौतिक प्रकृति के गुणों में रम जाता है, तो वह भूल से सोचने लगता है कि यह “मैं हूँ” और यह “मेरा” है। ।। २-९-२ ।।

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    यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः । रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ।। २-९-३ ।।

    As soon as the living entity becomes situated in his constitutional glory and begins to enjoy the transcendence beyond time and material energy, he at once gives up the two misconceptions of life [I and mine] and thus becomes fully manifested as the pure self. ।। 2-9-3 ।।

    जैसे ही जीवात्मा अपनी स्वाभाविक महिमा में स्थित हो जाता है और काल तथा माया से गुणातीत हो जाता है, वैसे ही वह जीवन की दोनों भ्रान्त धारणाओं (मैं तथा मेरा) को त्याग देता है और शुद्ध आत्मस्वरूप में प्रकट हो जाता है। ।। २-९-३ ।।

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    आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवान् ऋतम् । ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः ।। २-९-४ ।।

    O King, the Personality of Godhead, being very much pleased with Lord Brahmā because of his nondeceptive penance in bhakti-yoga, presented His eternal and transcendental form before Brahmā. And that is the objective goal for purifying the conditioned soul. ।। 2-9-4 ।।

    हे राजन्, भगवान् ने ब्रह्माजी की भक्तियोग की निष्कपट तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न होकर उनके समक्ष अपना शाश्वत दिव्य रूप प्रकट किया और बद्धजीव की शुद्धि के लिए यही परम लक्ष्य भी है। ।। २-९-४ ।।

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    स आदिदेवो जगतां परो गुरुः स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत । तां नाध्यगच्छद्दृशमत्र सम्मतां प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् ।। २-९-५ ।।

    Lord Brahmā, the first spiritual master, supreme in the universe, could not trace out the source of his lotus seat, and while thinking of creating the material world, he could not understand the proper direction for such creative work, nor could he find out the process for such creation. ।। 2-9-5 ।।

    प्रथम गुरु एवं ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ जीव होते हुए भी ब्रह्माजी अपने कमल आसन के स्रोत का पता न लगा सके और जब उन्होंने भौतिक जगत की सृष्टि करनी चाही तो वे यह भी न जान पाये कि किस दिशा से यह कार्य प्रारम्भ किया जाय, न ही ऐसी सृष्टि करने के लिए कोई विधि ही ढूँढ पाये। ।। २-९-५ ।।