1. 61

    शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा । कर्मात्मन्याहितं भुङ्क्ते तादृशेनेतरेण वा ।। ४-२९-६१ ।।

    The living entity, while dreaming, gives up the actual living body. Through the activities of his mind and intelligence, he acts in another body, either as a god or a dog. After giving up this gross body, the living entity enters either an animal body or a demigod’s body on this planet or on another planet. He thus enjoys the results of the actions of his past life. ।। 4-29-61 ।।

    स्वप्न देखते समय जीव अपने वास्तविक शरीर को त्याग देता है और अपने मन तथा बुद्धि के कार्यों से वह दूसरे शरीर में, यथा देवता या कुत्ते के शरीर में, प्रवेश करता है। इस स्थूल शरीर को त्याग कर जीव इस लोक में अथवा अन्य लोक में किसी पशु या देवता के शरीर में प्रवेश करता है। इस प्रकार वह अपने पिछले जीवन के कर्मफलों को भोगता है। ।। ४-२९-६१ ।।

  2. 62

    ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् । गृह्णीयात्तत्पुमान् राद्धं कर्म येन पुनर्भवः ।। ४-२९-६२ ।।

    The living entity labors under the bodily conception of “I am this, I am that. My duty is this, and therefore I shall do it.” These are all mental impressions, and all these activities are temporary; nonetheless, by the grace of the Supreme Personality of Godhead, the living entity gets a chance to execute all his mental concoctions. Thus he gets another body. ।। 4-29-62 ।।

    जीव इस देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत कार्य करता है कि, “मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, यह मेरा कर्तव्य है, अत: मैं इसे करूँगा।” ये सब मानसिक संस्कार है और ये सारे कर्म अस्थायी हैं; फिर भी भगवान् के अनुग्रह से जीव को अपने समस्त मनोरथ पूरे करने का अवसर प्राप्त होता है। इस लिए उसे दूसरा शरीर प्राप्त होता है। ।। ४-२९-६२ ।।

  3. 63

    यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियेहितैः । एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः ।। ४-२९-६३ ।।

    One can understand the mental or conscious position of a living entity by the activities of two kinds of senses — the knowledge-acquiring senses and the executive senses. Similarly, by the mental condition or consciousness of a person, one can understand his position in the previous life. ।। 4-29-63 ।।

    जीव की मानसिक स्थिति को दो प्रकार की इन्द्रियों—कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों—द्वारा समझा जा सकता है। इसी प्रकार किसी मनुष्य की मानसिक स्थिति से उसके पूर्वजन्म की स्थिति को समझा जा सकता है। ।। ४-२९-६३ ।।

  4. 64

    नानुभूतं क्व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् । कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं यादृगात्मनि ।। ४-२९-६४ ।।

    Sometimes we suddenly experience something that was never experienced in the present body by sight or hearing. Sometimes we see such things suddenly in dreams. ।। 4-29-64 ।।

    कभी-कभी हमें ऐसी वस्तु का अचानक अनुभव होता है, जिसे हमने इस शरीर में देख या सुनकर कभी अनुभव नहीं किया। कभी-कभी हमें ऐसी वस्तुएँ अचानक स्वप्न में दिख जाती हैं। ।। ४-२९-६४ ।।

  5. 65

    तेनास्य तादृशं राजन् लिङ्गिनो देहसम्भवम् । श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति ।। ४-२९-६५ ।।

    Therefore, my dear King, the living entity, who has a subtle mental covering, develops all kinds of thoughts and images because of his previous body. Take this from me as certain. There is no possibility of concocting anything mentally without having perceived it in the previous body. ।। 4-29-65 ।।

    अत: हे राजन्, सूक्ष्म मानसिक आवरण वाला यह जीव अपने पूर्व शरीर के कारण सभी प्रकार के विचार तथा प्रतिबिम्ब विकसित करता रहता है। मेरी बात को तुम निश्चय समझो। जब तक पूर्व शरीर में कोई वस्तु देखी हुई नहीं रहती, तब तक मन के द्वारा उसकी कल्पना करने की सम्भावना नहीं उठती। ।। ४-२९-६५ ।।