1. 21

    संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः । तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रयः स्मृताः । हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ।। ४-२९-२१ ।।

    What was previously explained as Caṇḍavega, powerful time, is covered by days and nights, named Gandharvas and Gandharvīs. The body’s life span is gradually reduced by the passage of days and nights, which number 360. ।। 4-29-21 ।।

    जिसे पहले चण्डवेग अर्थात् शक्तिशाली काल कहा गया था वह दिन तथा रात से बना है जिनके नाम गन्धर्व और गन्धर्वी हैं। शरीर की आयु दिन तथा रात के बीतने से क्रमश: घटती जाती है जिनकी संख्या ३६० है। ।। ४-२९-२१ ।।

  2. 22

    कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति । स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ।। ४-२०-२२ ।।

    What was described as Kālakanyā should be understood as old age. No one wants to accept old age, but Yavaneśvara [Yavana-rāja], who is death, accepts Jarā [old age] as his sister. ।। 4-29-22 ।।

    जिसे कालकन्या कहा गया है, उसे वृद्धावस्था (जरा) समझना चाहिए। कोई भी वृद्धावस्था नहीं स्वीकार करना चाहता, किन्तु यवनराज, जो साक्षात् मृत्यु है, जरा (वृद्धावस्था) को अपनी बहन के रूप में स्वीकार करता है। ।। ४-२०-२२ ।।

  3. 23

    आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चरा: । भूतोपसर्गाशुरय: प्रज्वारो द्विविधो ज्वर: ।। ४-२९-२३ ।।

    The followers of Yavaneśvara [Yamarāja] are called the soldiers of death, and they are known as the various types of disturbances that pertain to the body and mind. Prajvāra represents the two types of fever: extreme heat and extreme cold — typhoid and pneumonia. The living entity lying down within the body is disturbed by many tribulations pertaining to providence, ।। 4-29-23 ।।

    यवनेश्वर (यमराज) के अनुचर मृत्यु के सैनिक कहलाते हैं, जो शरीर तथा मन सम्बन्धी विविध क्लेश माने जाते हैं। प्रज्वार दो प्रकार के ज्वरों का सूचक है—अत्यधिक ताप तथा अत्यधिक शीत—जैसे टाइफाइड तथा निमोनिया। शरीर के भीतर लेटा हुआ जीव विविध क्लेशों द्वारा, ।। ४-२९-२३ ।।

  4. 24

    एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः । क्लिश्यमानः शतं वर्षं देहे देही तमोवृतः ।। ४-२९-२४ ।।

    to other living entities and to his own body and mind. Despite all kinds of tribulations, the living entity, subjected to the necessities of the body, mind and senses and suffering from various types of disease, is carried away by many plans due to his lust to enjoy the world. Although transcendental to this material existence, ।। 4-29-24 ।।

    जो दैविक, भौतिक तथा अपने ही शरीर तथा मन से सम्बन्धित हैं, विचलित होता रहता है। समस्त प्रकार के क्लेशों के होते हुए भी जीव इस संसार को भोगने की इच्छा से अनेकानेक योजनाओं में बह जाता है। निर्गुण (दिव्य) होकर भी जीव अपने अज्ञान के कारण अहंकारवश ।। ४-२९-२४ ।।

  5. 25

    प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः । शेते कामलवान् ध्यायन् ममाहमिति कर्मकृत् ।। ४-२९-२५ ।।

    the living entity, out of ignorance, accepts all these material miseries under the pretext of false egoism (“I” and “mine”). In this way he lives for a hundred years within this body. ।। 4-2-25 ।।

    (मैं तथा मेरा) इन भौतिक कष्टों को स्वीकार करता है। इस प्रकार वह इस शरीर के भीतर सौ वर्षों तक रहता है। ।। ४-२९-२५ ।।