1. 41

    मैत्रेय उवाच स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा । दर्शितात्मगतिः सम्यक् प्रशस्योवाच तं नृपः ।। ४-२२-४१ ।।

    The great sage Maitreya continued: Being thus enlightened in complete spiritual knowledge by the son of Brahmā — one of the Kumāras, who was complete in spiritual knowledge — the King worshiped them in the following words. ।। 4-22-41 ।।

    मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र कुमारों में से एक के द्वारा जो पूर्ण आत्मज्ञानी था, पूर्ण आत्मज्ञान प्राप्त करके राजा ने उनकी निम्नलिखित शब्दों से आराधना की। ।। ४-२२-४१ ।।

  2. 42

    राजोवाच कृतो मेऽनुग्रहः पूर्वं हरिणाऽऽर्तानुकम्पिना । तमापादयितुं ब्रह्मन् भगवन् यूयमागताः ।। ४-२२-४२ ।।

    The King said: O brāhmaṇa, O powerful one, formerly Lord Viṣṇu showed me His causeless mercy, indicating that you would come to my house, and to confirm that blessing, you have all come. ।। 4-22-42 ।।

    राजा ने कहा : हे ब्राह्मण, हे शक्तिमान, पहले भगवान् विष्णु ने मुझ पर अहैतुकी कृपा प्रदर्शित की थी और यह संकेत किया था कि आप मेरे घर पधारेंगे। आप लोग उसी आशीर्वाद की पुष्टि करने के लिए यहाँ पर आये हैं। ।। ४-२२-४२ ।।

  3. 43

    निष्पादितश्च कार्त्स्न्येन भगवद्भिर्घृणालुभिः । साधूच्छिष्टं हि मे सर्वमात्मना सह किं ददे ।। ४-२२-४३ ।।

    My dear brāhmaṇa, you have carried out the order thoroughly because you are also as compassionate as the Lord. It is my duty, therefore, to offer you something, but all I possess are but remnants of food taken by great saintly persons. What shall I give? ।। 4-22-43 ।।

    हे ब्राह्मण, आपने तो भगवान् के आदेश का सम्यक् पालन किया है, क्योंकि आप उन्हीं के समान उदार भी हैं। अत: यह मेरा कर्तव्य है कि आपको कुछ अर्पित करूँ, किन्तु मेरे पास जो कुछ भी है, वह साधु पुरुषों के भोजन में से बचा-खुचा प्रसाद ही है। मैं आपको क्या दूँ? ।। ४-२२-४३ ।।

  4. 44

    प्राणा दाराः सुता ब्रह्मन् गृहाश्च सपरिच्छदाः । राज्यं बलं मही कोश इति सर्वं निवेदितम् ।। ४-२२-४४ ।।

    The King continued: Therefore, my dear brāhmaṇas, my life, wife, children, home, furniture and household paraphernalia, my kingdom, strength, land and especially my treasury are all offered unto you. ।। 4-22-44 ।।

    राजा ने आगे कहा : अत: हे ब्राह्मणो, मेरा प्राण, पत्नी, बच्चे, घर, घर का साज-सामान, मेरा राज्य, सेना, पृथ्वी तथा विशेष रूप से मेरा राजकोष—ये सब आपको अर्पित हैं। ।। ४-२२-४४ ।।

  5. 45

    सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ।। ४-२२-४५ ।।

    Since only a person who is completely educated according to the principles of Vedic knowledge deserves to be commander-in-chief, ruler of the state, the first to chastise or the proprietor of the whole planet, Pṛthu Mahārāja offered everything to the Kumāras. ।। 4-22-45 ।।

    चूँकि केवल ऐसा व्यक्ति, जो वैदिक ज्ञान के अनुसार पूर्ण रूप से शिक्षित हो, सेनापति, राज्य का शासक, दण्डदाता तथा सारे लोक का स्वामी होने का पात्र होता है, अत: पृथु महाराज ने कुमारों को सर्वस्व अर्पित कर दिया। ।। ४-२२-४५ ।।