1. 16

    तस्मा उन्मादनाथाय नष्टशौचाय दुर्हृदे । दत्ता बत मया साध्वी चोदिते परमेष्ठिना ।। ४-२-१६ ‌।।

    On the request of Lord Brahmā I handed over my chaste daughter to him, although he is devoid of all cleanliness and his heart is filled with nasty things. ।। 4-2-16 ।।

    ब्रह्माजी के अनुरोध पर मैंने अपनी साध्वी पुत्री उसे प्रदान की थी, यद्यपि वह समस्त प्रकार की स्वच्छता से रहित है और उसका हृदय विकारों से पूरित है। ।। ४-२-१६ ।।

  2. 17

    मैत्रेय उवाच विनिन्द्यैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम् । दक्षोऽथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे ।। ४-२-१७ ।।

    The sage Maitreya continued: Thus Dakṣa, seeing Lord Śiva sitting as if against him, washed his hands and mouth and cursed him in the following words. ।। 4-2-17 ।।

    मैत्रेय मुनि ने आगे कहा : इस प्रकार शिव को अपने विपक्ष में स्थित देखकर दक्ष ने जल से आचमन किया और निम्नलिखित शब्दों से शाप देना प्रारम्भ किया। ।। ४-२-१७ ।।

  3. 18

    अयं तु देवयजन इन्द्रोपेन्द्रादिभिर्भवः । सह भागं न लभतां देवैर्देवगणाधमः ।। ४-२-१८

    The demigods are eligible to share in the oblations of sacrifice, but Lord Śiva, who is the lowest of all the demigods, should not have a share. ।। 4-2-18 ।।

    देवता तो यज्ञ की आहुति में भागीदार हो सकते हैं, किन्तु समस्त देवों में अधम शिव को यज्ञ-भाग नहीं मिलना चाहिए। ।। ४-२-१८ ।।

  4. 19

    निषिध्यमानः स सदस्यमुख्यैर्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् । तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्युर्जगामकौरव्य निजं निकेतनम् ।। ४-२-१९ ।।

    Maitreya continued: My dear Vidura, in spite of the requests of all the members of the sacrificial assembly, Dakṣa, in great anger, cursed Lord Śiva and then left the assembly and went back to his home. ।। 4-2-19 ।।

    मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, उस यज्ञ के सभासदों द्वारा मना किये जाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देता रहा और फिर सभा त्याग कर अपने घर चला गया। ।। ४-२-१९ ।।

  5. 20

    विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणीः नन्दीश्वरो रोषकषायदूषितः । दक्षाय शापं विससर्ज दारुणं ये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजाः ।। ४-२-२० ।।

    Upon understanding that Lord Śiva had been cursed, Nandīśvara, one of Lord Śiva’s principal associates, became greatly angry. His eyes became red, and he prepared to curse Dakṣa and all the brāhmaṇas present there who had tolerated Dakṣa’s cursing Śiva in harsh words. ।। 4-2-20 ।।

    यह जानकर कि भगवान् शिव को शाप दिया गया है, शिव का प्रमुख पार्षद नन्दीश्वर अत्यधिक क्रुद्ध हुआ। उसकी आँखें लाल हो गईं और उसने दक्ष तथा वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मणों को, जिन्होंने दक्ष द्वारा कटु वचनों में शिवजी को शापित किए जाने को सहन किया था, शाप देने की तैयारी की। ।। ४-२-२० ।।