1. 21

    श्रीभगवानुवाच अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना । तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ।। ३-२७-२१ ।।

    The Supreme Personality of Godhead said: One can get liberation by seriously discharging devotional service unto Me and thereby hearing for a long time about Me or from Me. By thus executing one’s prescribed duties, there will be no reaction, and one will be freed from the contamination of matter. ।। 3-27-21 ।।

    भगवान् ने कहा : यदि कोई गम्भीरतापूर्वक मेरी सेवा करता है और दीर्घकाल तक मेरे विषय में या मुझसे सुनता है, तो वह मुक्ति पा सकता है। इस प्रकार अपने-अपने नियत कार्यों के करने से कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी और मनुष्य पदार्थ के कल्मष से मुक्त हो जाएगा। ।। ३-२७-२१ ।।

  2. 22

    ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा । तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ।। ३-२७-२२ ।।

    This devotional service has to be performed strongly in perfect knowledge and with transcendental vision. One must be strongly renounced and must engage in austerity and perform mystic yoga in order to be firmly fixed in self-absorption. ।। 3-27-22 ।।

    यह भक्ति दृढ़तापूर्वक पूर्ण ज्ञान से तथा दिव्य दृष्टि से सम्पन्न करनी चाहिए। मनुष्य को प्रबल रूप से विरक्त होना चाहिए, तपस्या में लगना चाहिए और आत्मलीन होने के लिए योग करना चाहिए। ।। ३-२७-२२ ।।

  3. 23

    प्रकृतिः पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् । तिरोभवित्री शनकैरग्नेर्योनिरिवारणिः ।। ३-२७-२३ ।।

    The influence of material nature has covered the living entity, and thus it is as if the living entity were always in a blazing fire. But by the process of seriously discharging devotional service, this influence can be removed, just as wooden sticks which cause a fire are themselves consumed by it. ।। 3-27-23 ।।

    प्रकृति के प्रभाव ने जीवात्मा को ढक कर रखा है मानो जीवात्मा सदैव प्रज्ज्वलित अग्नि में रह रहा हो। किन्तु भक्ति करने से यह प्रभाव उसी प्रकार दूर किया जाता सकता है, जिस प्रकार अग्नि उत्पन्न करने वाले काष्ठ-खण्ड स्वयं भी अग्नि द्वारा भस्म हो जाते हैं। ।। ३-२७-२३ ।।

  4. 24

    भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः । नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ।। ३-२७-२४ ।।

    By discovering the faultiness of his desiring to lord it over material nature and by therefore giving it up, the living entity becomes independent and stands in his own glory. ।। 3-27-24 ।।

    प्रकृति पर अधिकार जताने की इच्छा के दोषों को ज्ञात करके और फलस्वरूप उस इच्छा को त्याग करके जीवात्मा स्वतन्त्र हो जाता है और अपनी कीर्ति में स्थित हो जाता है। ।। ३-२७-२४ ।।

  5. 25

    यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् । स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ।। ३-२७-२५ ।।

    In the dreaming state one’s consciousness is almost covered, and one sees many inauspicious things, but when he is awakened and fully conscious, such inauspicious things cannot bewilder him. ।। 3-27-25 ।।

    स्वप्नावस्था में मनुष्य की चेतना प्राय: ढकी रहती है और उसे अनेक अशुभ वस्तुएँ दिखती हैं, किन्तु उसके जगने पर तथा पूर्ण चेतन होने पर ऐसी अशुभ वस्तुएँ उसे विभ्रमित नहीं कर सकतीं। ।। ३-२७-२५ ।।