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    शौनक उवाच कपिलस्तत्त्वसङ्ख्याता भगवानात्ममायया । जातः स्वयमजः साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम् ।। ३-२५-१ ।।

    Śrī Śaunaka said: Although He is unborn, the Supreme Personality of Godhead took birth as Kapila Muni by His internal potency. He descended to disseminate transcendental knowledge for the benefit of the whole human race. ।। 3-25-1 ।।

    श्री शौनक ने कहा : यद्यपि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अजन्मा हैं, किन्तु उन्होंने अपनी अन्तरंगा शक्ति से कपिल मुनि के रूप में जन्म धारण किया। वे सम्पूर्ण मानव जाति के लाभार्थ दिव्य ज्ञान का विस्तार करने के लिए अवतरित हुए। ।। ३-२५-१ ।।

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    न ह्यस्य वर्ष्मणः पुंसां वरिम्णः सर्वयोगिनाम् । विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेऽसवः ।। ३-२५-२ ।।

    Śaunaka continued: There is no one who knows more than the Lord Himself. No one is more worshipable or more mature a yogī than He. He is therefore the master of the Vedas, and to hear about Him always is the actual pleasure of the senses. ।। 3-25-2 ।।

    शौनक ने आगे कहा : स्वयं भगवान् से अधिक जानने वाला कोई अन्य नहीं है। न तो कोई उनसे अधिक पूज्य है, न अधिक प्रौढ़ योगी। अत: वे वेदों के स्वामी हैं और उनके विषय में सुनते रहना इन्द्रियों को सदैव वास्तविक आनन्द प्रदान करने वाला है। ।। ३-२५-२ ।।

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    यद्यद्विधत्ते भगवान् स्वच्छन्दात्माऽऽत्ममायया । तानि मे श्रद्दधानस्य कीर्तन्यान्यनुकीर्तय ।। ३-२५-३ ।।

    Therefore please precisely describe all the activities and pastimes of the Personality of Godhead, who is full of self-desire and who assumes all these activities by His internal potency. ।। 3-25-3 ।।

    अत: कृपया उन भगवान् के समस्त कार्यकलापों एवं लीलाओं का संक्षेप में वर्णन करें, जो स्वतन्त्र हैं और अपनी अन्तरंगा शक्ति से इन सारे कार्यकलापों को सम्पन्न करते हैं। ।। ३-२५-३ ।।

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    सूत उवाच द्वैपायनसखस्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा । प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदितः ।। ३-२५-४ ।।

    Śrī Sūta Gosvāmī said: The most powerful sage Maitreya was a friend of Vyāsadeva. Being encouraged and pleased by Vidura’s inquiry about transcendental knowledge, Maitreya spoke as follows. ।। 3-25-4 ।।

    श्रीसूत गोस्वामी ने कहा : परम शक्तिमान ऋषि मैत्रेय व्यासदेव के मित्र थे। दिव्य ज्ञान के विषय में विदुर की जिज्ञासा से प्रोत्साहित एवं प्रसन्न होकर मैत्रेय ने इस प्रकार कहा। ।। ३-२५-४ ।।

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    मैत्रेय उवाच पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातुः प्रियचिकीर्षया । तस्मिन् बिन्दुसरेऽवात्सीद्भगवान् कपिलः किल ।। ३-२५-५ ।।

    Maitreya said: When Kardama left for the forest, Lord Kapila stayed on the strand of the Bindu-sarovara to please His mother, Devahūti. ।। 3-25-5 ।।

    मैत्रेय ने कहा : जब कर्दम मुनि बन चले गये तो भगवान् कपिल अपनी माता देवहूति को प्रसन्न करने के लिए बिन्दु सरोवर के तट पर रहे आये। ।। ३-२५-५ ।।